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User:JAI BABA VICHARPURI

From Wikimania

जय बाबा विचारपुरी

(बाबा विचारपुरी जी व उसके भगत जय दादा टाबर वाले का प्यार)

गाँव मतलोडा में पं. श्री तेलूराम ( तेलू भोला ) जी जय बाबा

विचारपुरी के सच्चे भगत थे | बाबा जी की कोई भी बात मना नही

किया करते थे | तन-से,मन-से, धन-से पंडित(तेलूराम जी) जी बाबा

जी की सेवा के लिए तत्पर त्यार रेट थे | जय बाबा विचारपुरी

महाराज जी पंडित जी को प्यार से टाबर वाला कहा करते थे लेकिन

बाबा की वाणी को कोई नही समझ पाया ओर ना पहले, ना ही

अब| ओर ना ही किसी ने समझने की कोशिस की ओर ना ही किसी

ने किसी को समझाने की | मै भी अब तक वही समझता जो अनजान

व्यक्ति कहते थे | मेरी भी तब समझ में आया जब दादा श्री रामेश्वर

ने खुलकर बताया |एक दिन की बात है के मै व दादा जी बैठे थे दादा

जी धार्मिक पर्वती के बुजुर्ग है वो रामायण, महाभारत, रामचरित्र

मानस इत्यादि धार्मिक पुस्तके अपने पास रखते थे ओर टाइम में से

टाइम निकाल कर वो पुस्तके पढ़ा करते थे ओर जो कोई भी उनके जो

कोई भी उनके पास बैठता था उनसे भी पढवाया करते थे ओर खुद

शांत बैठकर सुनते रहते थे | इसी स्वभाव के कारण मै भी उनके पास

जाने लग गया था | वो मेरे साथ सुख-दुःख की भी बाते कर लिया

करते थे उस दिन हम दोनों ही बैठे थे यु ही जय बाबा विचारपुरी जी

बात चल पड़ी तब मेरे भी मन में बाबा के बारे में कुछ जानने की

जिगासा जागी और मेने भी पूछ ही लिया दादा जी एक बात

बताओगे वो बोले पूछो बेटा पूछो पता होगा तो जरुर बताऊंगा | मै

बोला दादा जी मेरे दादा तेलूराम को बाबा जी टाबर वाला क्यों

कहा करते थे | तब दादा (रामेश्वर) जी कहने लगे देख भाई दुन्दला-

दुन्दला-सा याद है और मै बहुत ही छोटा लगभग 6-7 साल का था

तेरे दादा श्री तेलूराम मुझसे लगभग 20-22 साल बड़े थे ओर वो बड़े

ही सिल स्वभाव के साथ-साथ धार्मिक विचारो वाले थे, छोटे-बड़े का

फर्क जानने के साथ-साथ उनकी इज्जत करना भी जानते थे | हम तो

उनको सुरु से मंदिर के पुजारी के रूप में देखते आ रहे थे | वो किसी

कि भी नजरो में खटके बड़ी सोच-समंझ कर गृहस्ती का पालन किया

ओर मंदिर की गतिविधि भी हिन्दू रीतिरिवाज के रास्ते पर चलकर

अपने कर्तव्य के नियमो का पालन कर पुजारी की जो मरियादा

होती है उस मरियादा में रह कर भगवन के चरणों में अपना जीवन

व्यतीत किया|फिर मेने कहा दादा जी ये बात तो ठीक है मुझको तो

ये बातो की मेरे दादा को बाबा जी टाबर वाला किस कारण कहा

करते थे | दादा जी बोले बेटा ध्यान से ओर समझो | जब तुम्हारे

दादा कि सादी भी नही हुई ओर उमर भी ठीक-ठीक ही |जय बाबा

विचारपुरी कुटिया में तुम्हारे दादा तेलूराम जब भी जाते थे तो उसके

साथ में उसकी उम्र में चार-पांच यार-बेली हुआ करते थे उनको

देखकर जय बाबा विचारपुरी महाराज जी तेरे दादा को कहते थे

देखो वो आ गया टाबर वाला | महाराज जी एक ही बात में दो युगों

की बात कह दी, मेने पूछा दादा जी वो केसे, दादा जी बोले सुनो बेटा

महाराज एक तो वर्तमान के बारे में कहा है मेने पूछा वो केसे दादा

जी बेटे जब तेरे दादा जी डेरा आते थे तो उनके साथ में 4-5 युवाओ

को देखकर , ठीक है दादा जी वर्तमान युग की तो बात मेरी समन्झ

आ गई |इसमें तो एक ही युग हुआ आप तो दो युगों की बाते कर रहे

थे मेने दादा जी से कहा , सुन बेटा सुन दुसरे युग के बारे में भी

बताता हूँ दादा जी बाले जय बाबा विचारपुरी महाराज जी तो

अन्तर्यामी थे वो आने वाले कल के बारे में भी जानते थे महाराज जी

को दिखाई दे रहा था आने वाला कल मेरे भगत तेलूराम का परिवार

हर ओर फुले-फलेगा ओर हर तरफ मेरे भगत तेलूराम का नाम मेरे

नाम के साथ सचे भगतो में लिया जायेगा |मेने कहा दादा जी ये बात

तो समन्झ आ गई पर एक बात समन्झ नही आ रही है दादा जी

बोले बेटा कोनसी बात समन्झ नही आ रही है फिर मेने हिझाकते हुए

पूछ ही लिया ,दादा जी सब कहते तेरे दादा तेलूराम की कोन सादी

करता वो तो बुढा हो चूका था तुम्हारे परिवार पर तो जय बाबा

विचारपुरी का आशिर्वाद है इसीलिए तेरे दादा कि सादी हो गई थी

ओर उन्ही के कारण आज तुम्हारा परिवार फल-फुल रहा है |दादा

रामेश्वर जी बोले बेटा इसमें एक बात तो सही तुम्हारे परिवार पर

जय बाबा विचारपुरी जी महाराज का आशिर्वाद तो है इस सचाई

को कोई झुटला नही सकता |पर कुछ अनजान भगतो के द्वारा सुनी-

अनसुनी बातो को तोड़-मडोकर कहा गया है | मेने कहा दादा जी

फिर आप ही बताइगा के सच्चाई क्या है, तो सुनो दादा जी बोले, मेने

कहा तो दादा जी सुनाओ | फिर दादा जी ने मुझको विस्तार से

बताया के जब तुम्हारे दादा तेलूराम कुटिया में जाते थे तो लगभग

27-28 साल के होंगे क्योकि मेरे समीकरण के अनुसार वो मुझसे 20-

22 साल बड़े थे ओर मै उस समय 7-8 साल का था | उस समय माँ-

बाप अपने बच्चो की सादी कम उमर में ही कर दिया करते थे| उस

समय यदि किसी लडके की 20-22 साल की उमर में या इससे पहले

नही हो पाती थी तो उसके बाद उस लडके की सादी होने की आशा

ही छोड़ देते थे | आपको तो पता ही बेटा लोगो का तो काम ही है

एक की दो बनाना ओर एक दुसरे के सामने एक दुसरे को निचा

दिखाना ओर उसकी हंशी उड़ाना |

जय बाबा विचारपुरी जीवन गाथा

मतलोडा की तप भूमि पर एक बड़े ही महान साधू अपने

चरण कमलो के सप्रस से यहाँ की भूमि को स्वर्ग के समान बनया है

जिन्होंने भक्ति और तपस्या से बहुत ही सिद्धियाँ प्राप्त की जिनका

जन्म गाँव दडाना जिला संगरूर पंजाब की पावन स्थली पर हुआ |

वो अपने गृहस्ती जीवन में सहनशील ओर धार्मिक विचारों के व्यक्ति

थे | जाती से जाट व गोत्र से कलेर ओर गाँव में दडाना के दलाना

पाना में रहते थे| उनका गृहस्ती नाम केहर सिंह था परन्तु सभी

इनको प्यार से केहरू कहकर बुलाते थे| एक इनका भाई हरनेक सिंह

था| दोनों भाई शादी शुदा थे ओर दोनों इकठे रहते थे दोनों के

विचार व स्वभाव में बहुत अंतर था | केहरू सिदे-सादे व भोले-भाले

थे| जबकि हरनेक सिंह चंचल व चालाक थे|

एक बार की बात है की केहरू खेतों में पशुओं के लिए

घास-फूस लेने के लिए गये हुए थे गर्मिओं के दिन थे| उनके पास एक

भेंस भी थी जो

तेथण थी | उस दिन हरनेक सिंह घर पर ही थे| एक भोला-भाला

व्यापारी उनके घर आया | नेकी ने भेंस उस व्यापारी को 18 रूपए में

बेच दी| नेकी ने उस भेंस को चार थनों वाली कह कर दी ओर उस

भोले-भाले व्यापारी ने उस पर विश्वास कर वंहा से चल दिया |

जिस रस्ते से व्यापारी को अपने घर जाना था उसी रस्ते

पर केहरू सिंह के खेत थे |केहरू सिंह अपने खेत से पशुओ के लिए

घास-फूस लेकर घर आ रहा था ओर व्यापारी भेंस लेकर उसी रस्ते से

अपने घर जा रहा था |परमात्मा की कृपया से न जाने किस कारण

दोनो में वार्तालाप शुरू हो गई | दोनों एक पेड़ के नीचे बैठकर

आराम करने लगे | व्यापारी ने केहरू से भेंस के बारे पूछने लगा भाई

जी भेंस के बारे में बताओ केसी लग रही मै इसको 18 रूपये में लेकर

आया हूँ क्या ठीक लेली क्या , केहरू सिंह बोले भाई ये भेंस तो

हमारी ही थी आप जिससे लाये हो वो मेरा बड़ा भाई हरनेक सिंह

था | व्यापारी बोला भाई फिर तो आप भेंस के बारे में सब कुछ

जानते होगे हाँ भाई भेंस बड़ी ही सरीफ है | बच्चे-बुजुर्ग, विर्वानी केसे

भी हराचारा डाले, पानी पिलाये कुछ भी नही कहती| ये भेंस तो

हमारी गऊ की तरह है भाई | व्यापारी बोला ये बात ठीक है भाई

दुध ठीक ठाक दे देती होगी हाँ भाई धार तो चाये बच्चा भी निकले

कुछ नही कहती | अंत में केहरू सिंह बोला भाई इस भेंस में कोई

कमी नही, बस एक के सिवा |इतना सुनते ही व्यापारी प्यार से

बोलने लगा भाई वो क्या है जरा मुझको भी तो बताओ |केहरू बोला

ये भेंस तेथ्न है |इतना सुनते ही व्यापारी केहरू से बोला नही भाई

ऐसा नही हो सकता आप हमसे छुठ बोल रहे हो या फिर मुझसे

मझाक कर रहे हो| केहरू सिंह बोला भाई न तो मैने कभी छुठ बोली

है ओर न ही मेने आपसे कोई मझाक किया जो सच्चाई है वो ही मेने

आपको बताई है | केहरू सिंह वंही आराम करने लगा और व्यापारी

वापिस मुड कर हरनेक सिंह के घर कि ओर चल दिया| व्यापारी ने

हरनेक सिंह से कहा भाई जी आपने भेंस छुट बोलकर बेचीं है , ये भेंस

तो तेथन है इतना सुनते ही हरनेक सिंह चोंक कर व्यापारी की ओर

देखने लगा और कहने लगा नही भाई किसी ने आपको छुट बोला है

भेंस के चारो थन सही है ये तेथन नहीं , व्यापारी बोला हरनेक सिंह

यदि ओर कोई कहता तो मै नही मानता पर आपके भाई ने ही ये सब

बाते बताई है | जिसकी बातो से ही पता चल रहा था कि वो छुट

नही बोल रहा है |इतना कहकर ओर अपने रूपए लेकर व्यापारी

वंहा से चला जाता है ,हरनेक सिंह भी इतनी बात होने पर परेसान

होकर बाहर गुमने चला जाता है | जब इन सब बातो का पता

हरनेक सिंह की पत्नी को चलता है तो वो गुसे से लाल-पिली हो

जाती है ओर केहर सिंह का इंतजार करने लग जाती है अपने गुस्से

की भड़ास निकने के लिए| थोड़ी देर में ही केहर सिंह घर आ जाता

है| उसको देखते ही उसकी भाभी गली-गलोच से उसका स्वागत

करने लग जाती है |जो भी मुह में आता वोही बक देती है |ओर

कहती है कि हमने तो बड़ी मुस्किल से उस भेंस को बेच दिया पर इस

सत्यवादी हरिसचंदर की ओलाद ने वो भी नही बिकने दी ओर उस

व्यापारी को सारी बात सही-सही बताकर अपने आपको सत्यवादी

समझ रहा है| ना काम का, ना ही काज का दुसमन है नाज का ओर

न ही कही निकल कर जाता है जो इससे पीछा ही छुट जाये | केहर

सिंह ये सब बाते श्यान्त स्वभाव से सुनकर बिना कुछ कहे उसी

समय वंहा से चल दिया |

केहर सिंह घरबार त्यागकर सन्यास की राह

पर चलदिया |साधुओं की संगत में रहने लगे ओर संगत में रहते रहते

केहर सिंह एक दिन हरियाणा राज्य के जिला कैथल के गाँव लधाना

में राजपुरी मंदिर में आ गए|



यह मन्दिर बाबा लधाना के नाम से प्रसिद्ध जाता है| वंहा पर

उन्होंने कई महीनो तक साधू-संतो की तन-मन से सेवा की ओर

अपना तन-मन पूरी तरह भगवन को अर्पित कर दिया ओर साधू

बनने का मन बना लिया |

केहर सिंह ने .......................बाबा से गुरु शिक्षा

ग्रहण की ओर गुरु जिओं ने केहर सिंह को साधू-संगत के आशिर्वाद से

जय बाबा विचारपुरी नाम दे दिया |तभी से उस संत को गृहस्ती

नाम छोड़कर जय बाबा विचारपुरी के नाम से जाना जाने लगा| जय

बाबा विचारपुरी पर गुरु की ऐसी कृपया हुई के गिने-चुने दिने में ही

रिधि-सिद्धि प्राप्त कर ली|सच्चाई की राहों पर चलने वाले इन्सान

यदि साधू संगत करने लगे तो भगवान को पाना बहुत आसान हो

जाता है ओर यदि ऐसा इन्सान साधू का चोला ही लेले तो भगवान

उस साधू तुरंत ही मिल जाता है |

जय बाबा विचारपुरी जी महाराज ने कई वर्षो

तक साधूओ की सेवा की ओर अपने गुरुजनों की कृपया अपने उपर

बनाये रखी |जय बाबा विचारपुरी सम्पूर्ण साधू शिक्षा ग्रहण कर

वंहा से चल दिए | कई धार्मिक स्थानों पर गये एक-दो दिन रहे ओर

वंहा से चल दिए ओर अपनी कुछ-ना-कुछ चिन्ह (निसान) छोड़ देते

है|

अंत में आकर वो हरियाणा के जिला जींद के गाँव दनोदा की पावन

स्थली पर एक झाल के नीचे डेरा डाल लिया ओर अपना दूना चेतन

कर गुरुध्यान में लग गए | एक-दो दिन तक तो बाबा जी के पास दो-

चार ही साधू-संगत व धार्मिक प्रवति वाले लोग आने जाने लग गए

कुछ लोग तो बाबा जी के खिलाफ भी हुआ करते थे लेकिन समय

आता रहा ओर उन्हें बाबा कि परख होती रही , बाबा के चरणों में

आते रहे | बाबा जी को खाने-पीने का कोई सोंक नही था जेसा भी

मिलता वेसा ही खा लेते | न ही कोई विशेष वस्तु अपने पास रखी

जिसमे मोह हो जाये | बाबा जी पहले कुतो को भोजन कराकर फिर

स्वंय किया करते |

जय बाबा विचारपुरी महाराज जी जहा गए वंहा-

वंहा अपनी रिधिसिधि की छाप छोड़ देते | जन्हा भी किसी गाँव में

रहने का स्थान बनाया वो तालाब के पास ही किसी भी वृक्ष के नीचे

बनाया | महाराज गाँव दनोदा से चलते गाँव सैथली में तालाब पर

अपना दुहना चेतन किया ओर उस नगरी के हर प्रकार के दुःख दूर

किये |

गाँव सैथली से चलकर गाँव लितानी में साधू-संगत कर वंहा से चल

दिए , बताते है की बाबा विचारपुरी जी महराज जी

गाँव लितानी में साधुओं संतो के पास बैठते थे परन्तु वंहा दुहना

चेतन नही किया | लितानी से चलकर महाराज जी पहुंचे हसनगढ़

गाँव | इस गाँव में भी बाबा जी ने साधू-संगत की ओर वंहा से

चलकर जिला हिसार के गाँव मतलोडा की पवित्र स्थली पर स्तिथ

तालाब के किनारे खड़े पीपल के वृक्ष के नीचे अपना आसन लगा

लिया ओर दुहना चेतन कर लिया | कहते है की बाबा से पहले ये

तालाब गूंजता ( भेंट लेने जैसी आवाज) था बाबा जी के आसन लगाने

के बाद यंहा कोई भी अशुभ दुर्घटना नही घटी |

गाँव मतलोडा में जय बाबा विचारपुरी जी महाराज

जी अपनी रिधिसिद्धि से अनेक चमत्कार दिखाए | बाबा जी का

कहना था की मेरी कुटिया जिस किसी गाँव में होगी वो तालाब के

किनारे पर ही मिलेगी इसका भी एक कारण है वो है, जिस किसी

घर में पशु-पक्षिओ में किसी भी प्रकार कि बीमारी हो ,डेरे के

नजदीकी तालाब से एक बार मुझको यादकर सात बार मिटटी

निकाल देना ओर अमावस्या को ज्योत जगाने से घर की हर प्रकार

की बीमारी दूर हो जाएगी| डेरे में चेतन दुहने से चुटकी भर बभुती

ले ओर उसको चाटकर अपने छाती पर लगा ले| ऐसा करने से मन

को शांति व हर प्रकार की ओपरी-पराई दूर हो जाएगी | गाँव

मतलोडा में मिला महाराज जी को एक परम शिष्य जिनका नाम

पंडित श्री तेलूराम (भोला) था | पंडित जी बाबा की सेवा तन-मन-

धन से किया करते थे जय बाबा विचारपुरी जी महाराज पंडित जी

को प्यार से टाबर आला कहा करते थे| ओर साथ ही ये भी कहा

करते थे कि पंडित जी के परिवार को बाबा की देन ही कहेंगे | ये सब

बाते सुनने वाले भगत बाबा हंसी किया करते थे, बाबा उनको बस

यही बात कहते थे की इस हंसी का जबाब आपको वक्त ही देगा|

इतना कहते ओर बाबा जी चुप हो जाते थे | बाबा जी तम्बाकू पीते

थे वो भी हुक्की के टूटी हुई चिलम में पीते थे इस पर भगत कह भी देते

थे बाबा जी नई चिलम ले आयें ये टूट गई है बाबा जी कहते ना भाई

ना नई चिलम में मोह होजुगा | बाबा जी कभी भी नई चिलम नही

ली तम्बाकू पीने के लिए|

गाँव मतलोडा से बाबा जी गाँव डाढ चले जाते | इस गाँव

में भी बाबा जी ने तालाब के किनारे दुहना चेतन कर गाँव में हर क्षेत्र

में सुख-समर्धि की राह खोल दी|

गाँव डाढ से बाबा जी सोथा गाँव

में अपनी रिधिसिद्धि से दीनदुखियो के दुःख दूर किये ओर अपना

दुहना चेतन कर इस स्थली को भी पवित्र कर दिया |सोथा गाँव से

बाबा जी

गाँव बनभोरी पहुंचते है | ओर यंहा भी बाबा जी ने अपने गुरुजनों के

आशीर्वाद से अपने दुहने के हवन से गाँव बनभोरी को भी स्वर्ग के

समान बनादिया | दुखिओं का दुःख बाबा के दरबार पर आने मात्र से

ही दूर होने लगे| गाँव बनभोरी से बाबा जी

नचार गाँव जाकर अपनी कुटिया बना लेते है ओर उसी कुटिया में

दुखिहारों के दुःख हरने लगे | इस प्रकार बाबा जी वापिस गाँव

दनोदा पहुंच जाते है |

बाबा जी जब गाँव मतलोडा में रहते थे तब

उनकी कुटिया के आस-पास कुछ भी नही था| बाबा की कुटिया

तालाब के किनारे थी| बाबा की कुटिया बाबा ने अपने तरीके से इस

प्रकार से बना रखी थी कि देखने वाले को अतिसुंदर दिखाई दे| कच्ची

ईंटो से कमरा व तालाब के मिटटी से बने हुए टील्लो से चार दिवारी

बनाई हुई थी |कमरे के पास कच्चा दुहना बना रखा था यह दुहना

तालाब की मिटटी व गाय के गोबर से बना रखा था |बाबा जब भी

गाँव मतलोडा में आते थे तो भगतो से मिलने वालों का ताँता लगा

रहता था |ओर सभी भगत बाबा की सेवा में लग जाते थे| बाबा की

सेवा में कोई गोसे, कोई लकड़ी, दूध , चाय, रोटी इत्यादि सामान

लाने लग जाते है| बाबा जी जो भी वस्तु मांगे वोही बाबा जी को

भगत दे देते है| क्योकि सभी बाबा जी के चमत्कारों से वाकिफ थे|

वो जानते थे की बाबा जी अगत की जानने वाले है| ओर जो भी

वाणी बाबा जी अपने मुख से निकल देते थे वो सत्य होती थी |

दादा टाबर वाले परिवार ने 31/05/2003 सूर्यग्रहण की

अमावस्या के पावन अवसर पर पुराणी समाधि स्थल का स्थान

बदला गया क्योकि पुराणी मन्डी खण्डित होती जा रही थी तालाब

के पानी से मिटटी कटती जा रही थी |

23/06/2008 को चारदीवारी के निर्माण के लिए बच्चो ने

मिलकर गेंहू की उग्वाही की ओर उन गेंहू के पैसों से चारदीवारी कि

सुरवात की गई | यंहा से मुझको कुछ सिखने को मिला | बल्कि इस

ज्ञान से तो मेरे पिता जी गुस्से में आकर उनसे लड़ने ही लगे | लेकिन

हमने कहदिया जो ये करते है उनको करने दो, वो जिस नजरिये से ये

कार्य कर रहे है बाबा जी उनको उसी नजरिये से फल देगा |

23/01/2012 जय बाबा विचारपुरी की कुटिया में

पहली बार हवन किया गया | यह हवन भी बच्चो के द्वारा ही

करवाया गया | बैठे-बैठे ही बच्चो के मन में ख्याल आया के जय बाबा

विचारपुरी की कुटिया में हवन करवाया जाए | बच्चो ने वंही से

रुपियो की उग्वाही सुरुकर दी | बाबा के आशीर्वाद से बच्चो ने बहुत

ही बदिया मनेजमेंट की |इस शुभ अवसर पर सभी गणमान्य बुजुर्गो,

नोजवान साथियो व माताओं ओर बहनों ने बड़-चढ़ कर भाग लिया

ओर बाबा के प्रति अपने प्यार को दर्शाया | हवन पुरे हिन्दू

रीतिरिवाज व सम्पूर्ण मंत्रो उचारण के साथ साथ शुद्धता के साथ

करवाया गया |हवन में सामिल होने के लिए श्री श्री 1008 सिद्ध जय

बाबा इछापुरी डेरा में निमन्त्रण दिया गया जहा पर बाबा फूलपुरी

जी रहते है | किसी कारण फुलपुरी जी महाराज हवन में सामिल

नही हो सके| महाराज जी की पूजा व बाबा इछापुरी महाराज की

दजा डेरे में पहुंचा दी| एक बहुत ही महत्वपूर्ण बात का हमें बाद में

पता चला | पहली बात तो सोमवती अमावस्या बहुत शुभ मानी

जाती है दूसरी बात माह मास की अमावस्या के दिन ही जय बाबा

विचारपुरी महाराज ने चोला छोड़ा था| हम बच्चे बड़े ही

सोभाग्यशाली थे जो बाबा जी ने एक शुभ दिन के शुभ कार्य के लिए

हम बच्चो को आशिर्वाद देकर हमारे हाथो ऐ कार्य करवाया |अंत में

हम सब ने निर्णय लिया कि बाबा के निर्माणाधीन कुटिया के कार्य को

शुरू की तरह किया जाये |सभी ने अपने अपने विचार रखे ओर अंत

में सभी ने निर्णय लिया की जय बाबा विचारपुरी जी महाराज की

कुटिया की चारदीवारी का कार्य शुरू किया जाये |

05/06/2012 जय बाबा

विचारपुरी जी महाराज जी की कुटिया की चारदीवारी के लिए किस

तरीके से चंदा इक्ठा किया जाये इस बात के लिए ब्राह्मण मोहले के

गणमान्य व्यक्तिओ को शिव मंदिर के प्रांगन में इक्ठा किया गया ओर

उन सब से इस बारे विचार-विमर्स किया गया | अंत में सभी ने 100-

100 रूपये तागड़ी के हिसाब से उग्वाही शुरु करने पर सहमत हो

गए| ओर इसी हिसाब से उग्वाही शुरू कर दी| पैसे सभी दे रहे थे

लेकिन बीच में ही कुछ सरारती तत्वों ने कार्य को सिरे तक नहीं

चढ़ने दिया | हम तो साफ मन से कार्य में लगे हुए थे हमें नही पता

था के उनके दिल में क्या चल रहा है|उनके हाथ में रूपये थे ओर

हमरे हाथ कोपी थी | हमारे उनकी नियत समन्झ आ गई ओर हमने

उनका साथ छोड़ दिया | उन्होंने रूपये अपने पास रख लिए ओर

हमने उनको हिसाब की कोपी नही दी | कुछ दिन तक युही बीत गए

कोई किसी को कुछ नही कहता है| हाँ मेरी समन्झ में एक बात तो

आ रही थी कि हर आदमी दुसरे के कन्दे से बंदूख चलाना चाहता

था| इस कारण हमने उन रूपये की आस छोड़ दी|

11/03/2013 दिन सोमवार को मै मेरे दोस्त सतीस

चहल के साथ के उसके गांव सोथा गया। मेने सुना के यहा श्री श्री

1008 सिद्ध बाबा विचारपुरी महाराज जी का मंदीर है ये सुनते ही

मेरे मन मे वहा जाने की जिगासा हुई । वहा पहुचा तो मन को बहुत

शांति मिली , सोभाग्य से उस दिन अमावस्य थी और वहा पर

भण्डारा चल रहा था भगतो ने बताया के बाबा के यहा हर अमावस्य

को भण्डारा लगाया जाता है । जिसे देखकर मेने अपने आप को ओर

भी भाग्यशाली समझा जो बाबा जी का प्रसाद चखने को मिला।

वहा पर बाबा जी का सुंदर मंदिर, पीने के पानी की सुविधा, साधु के

रहने की सुविधा, फूल पौधे देखर मैरा मन पसीज गया कास मैरे गांव

मतलोडा मे भी ऐसा नजारा देखने को मिलेगा कभी, ऐसा सोचते-2

मेरी आँखो मे पानी आ गया| बाबा विचारपुरी के भगतो जागो ओर

लोगो को भी जगाओ श्री श्री 1008 बाबा विचारपुरी महाराज की

जय | उसी दिन मै वन्ही सतीस के पास रह गया श्याम को बाबा

विचारपुरी की कुटिया से एक भगत ज्यानी लेने आया मै भी वंही

बैठा उस भगत ने पूछा ये भाई कोण है उन्होंने बताया ये गाँव

मतलोडा से पंडित जी है सतीस का दोस्त | गाँव का नाम सुनते ही

वो भगत बोला जय बाबा विचारपुरी की कुटिया तो मतलोडा में भी

है ओर एक पंडित जी थे जिनको बाबा जी टाबर वाला कहा करते

थे| मै बोला हाँ जी मै उन्ही का पोता हूँ | उन्होंने हमसे पूछा पंडित

जी आपके गाँव में बाबा जी की केसी कुटिया है मैने कहा भगत

जी वंहा पर बाबा की कुटिया निर्माणाधीन है कार्य चल रहा पर

कुछ कारण वंस कार्य में रुकावट हो गई | उसने मुझ को कहा

पंडित जी कुछ भी रुकावट हो आप एक बार बाबा विचारपुरी

जी का अपने दादा टाबर वाला नाम लेकर चिनाई सुरु कर

दो मेरा विश्वास है कि काम आपका सिद्ध हो जायेगा